Sunday, 22 May 2016

छोटे शहरों में रोजगार


13 दिसंबर को प्रकाशित लेख 'शहर खुलता है किसी किताब की तरह' पढ़ा। यह पढ़ना मार्मिक है कि अपने शहर जाने का मन होता है, पर रोजगार की मजबूरी और दूर कर देती है। आजादी से पहले, आजादी के समय और आज 67 वर्ष बाद भी समस्या ज्यों की त्यों है। कई सरकारें आई और चली गई। पर इस समस्या पर किसी का आज भी ध्यान नही है कि छोटे शहरों और कस्बों में भी रोजगार उपलब्ध हो। आज गिनती के दस बारह शहरों में रोजगार मिलता है यहां आबादी का भारी दबाव है, बाकी स्थानों से लोग धीरे-धीरे शहरों की और पलायन कर रहे हैं। रोजगार हो तो कौन दूर परदेश जाना चाहिए। सरकार जागे तो लोग घर वापसी करें।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 17 दिसम्बर 2014 को प्रकाशित हुआ)