Thursday, 19 May 2016

जिससे उम्मीद हो


संपादकीय 'आधी आबादी का चुनाव' (8 मार्च) में आपने जो प्रश्न उठाए हैं, देश के नेता इस समय उससे कोसों दूर भागते नज़र आते हैं। चुनाव में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण बिल पर कोई भी दल रूचि नही दिखा रहा है। सिर्फ शोर तक सिमट कर रह गया है यह प्रश्न। कोई उत्तर देने को तैयार नही। आश्चर्य है कि जिस देश में पिछले दस वर्षों से एक महिला का राज रहा है और कई प्रदेशों में महिला मुख्यमंत्री हैं, वहां महिलाओं के उत्थान की कोई बात नही होती है। उनकी सुरक्षा के लिए भी सिर्फ कोरे भाषण दिए जाते हैं। कैबिनेट में भी न के बराबर स्थान होता है। यह ठीक है कि चुनाव में आज एक मजबूत सरकार की आवश्यकता है जो हर क्षेत्र में देश को और आगे ले जा सके। भ्रष्टाचार जैसे दानव को मार गिराना है। लेकिन हम भूल जाते हैं कि बिना महिला भागीदारी के आप कुछ नही कर सकेंगे। यह भी ठीक है कि राजनीति में अपना स्वार्थ देखा जाता है। अतः महिलाएं वोट देते समय अपना स्वार्थ देखें। मतलब, वोट उसे दें, जिससे कुछ करने की उम्मीद हो। तभी हमारे नेता सुधरने का नाम लेंगे।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 11 मार्च 2014 को प्रकाशित हुआ)