Tuesday, 17 May 2016

बेटियों के लिए


इस संडे को हर अखबार में डॉटर्स डे पर कई लेख पढ़े। बेटी दिवस सिर्फ मीडिया तक ही सिमित है, क्योंकि जिस देश की 49 प्रतिशत जनता महिलाएं हैं, वहां सरकार और विपक्ष को दरअसल बेटियों और महिलाओं से कोई सरोकार नही है। बेटियां सड़कों पर असुरक्षित हैं। संसद में महिलाओं की 50 प्रतिशत सीटों के लिए सभी उदासीन हैं। यह हैरानी की बात है कि जिस देश में महिला प्रधानमंत्री रह चुकी हो, कई राज्यों में महिला मुख्यमंत्री हों और यूपीए की चेयर पर्सन भी एक सशक्त महिला हो, वहां महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत सीटों का मामला वर्षों से लटका हुआ  है। जबकि यह बेटियों को सशक्त बनाने के लिए ठोस कदम हो सकता है।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 23 सितम्बर 2013 को प्रकाशित हुआ)