Monday, 9 May 2016

पार्किंग बने पार्क


23 अक्टूबर को मैरी कॉम का लेख 'शहरी बच्चे क्या बालकनी और कॉरिडोर में खेलेंगे' बिलकुल सही बातें उठाता है। इसे पढकर अपने छुटपन के दिन याद आ गए। बचपन में देखा था कि पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने कपड़ो के बाजार से फाउंटेन तक पार्क ही पार्क थे। जबकि आज सिर्फ टाउन हॉल के पास क्वींस पार्क के नाम से प्रसिद्ध छोटा सा पार्क है। पार्क तो अब पार्किंग बनते जा रहे हैं। जब लोगों ने सोसाइटी में रहना शुरू किया, तो पार्क और खाली जगह पार्किंग बन गई। वहां बच्चे खेल नही सकते, क्योंकि कारों को नुकसान हो सकता है। दिल्ली की सड़कों पर कोई भी बच्चा उछलता-कूदता निर्भीक होकर नही चल सकता। बच्चे दौड़ें-भागे, एक दूसरे से गुत्थम-गुत्था हों। और फिर पटकनी दें। इसकी गुंजाईश कहां बची है? इस तरह से उनका मानसिक विकास भी सही रहता है। यही नही, सरकारी पार्कों में जाने पर वहां क्रिकेट या फुटबॉल खेलने की मनाही साफ़-साफ़ लिखी होती है। बच्चों के प्रति हमारी सरकार की उदासीनता ने हद कर दी है। सरकार भी खाली प्लाट बेच कर प्रॉफिट कमाना चाहती है। ऐसे हालात में आने वाले दिनों में बच्चों के हाथ में सिर्फ कंप्यूटर गेम्स रह जायेंगे। ओलंपिक में मैडल की उम्मीद हम वैसे भी कम ही करते हैं। मैदान ही नही रहेंगे, तो आस भी नही रहेगी।

(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 27 अक्टूबर 2012 को प्रकाशित हुआ)