Tuesday, 26 April 2016

मामला अच्छे नाम का


संपादकीय 'मामला अच्छे नाम का' में आप के विचार एकदम सही हैं कि स्कूलों का बाजारीकरण सही नही है। अब सरकार ने निजी स्कूलों के आगे घुटने लगभग टेक दिए हैं। सरकारी स्कूलों की हालत दिल्ली में बहुत खस्ता है। कोई भी अपना बच्चा सरकारी स्कूल में नही पढ़ाना चाहता। इसी कारण जनता ने निजी स्कूलों का रुख किया।
नतीजा, स्कूलों की मनमानी और महंगी शिक्षा। इस के पीछे 2 मुख्य कारण हैं। पहला, अब निजी स्कूलों का प्रबंधन असल में जनता के चुने प्रतिनिधियों के पास है जो नही चाहते कि शिक्षा सस्ती हो क्योंकि सस्ती शिक्षा पर उन का मुनाफा कम होता है। दूसरा सरकारी स्कूलों  में शिक्षा स्तर को ठीक करने में सरकार की नाकामी। सरकार के पास पैसे की कोई कमी नही है क्योंकि हर करदाता से सरकार शिक्षा के नाम पर 3 प्रतिशत के आधार से कर वसूलती है, लेकिन उस का सही उपयोग नज़र नही आ रहा है।
हर मांबाप की इच्छा होती है कि उस का बच्चा अच्छी शिक्षा प्राप्त करे। वे अपनी जरूरतों और इच्छाओं को दबा कर अपने बच्चों की शिक्षा का प्रबंध करते हैं। इसी कमजोरी का फायदा निजी स्कूल वाले उठाते हैं। सरकार को चाहिए कि या तो शिक्षा के स्तर को अपने स्कूलों में सुधारे या फिर शिक्षा कर ही बंद कर दे, ताकि करदाताओं को थोड़ी राहत मिल सके।


(यह पत्र सरिता फरवरी (द्वितीय) 2011 अंक में प्रकाशित हुआ)