Thursday, 21 April 2016

सामाजिक मुद्दों पर


सरिता, जून (द्वितीय) 2010 अंक में लेख 'सामाजिक मुद्दों पर खोखली सरकार' में लेखक के विचार एकदम ठीक हैं। सांझा सरकार चलाते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की विडंबना यही रही है कि विभिन्न दलों की सुनते सहते देश और समाज के उत्थान पर जितना ध्यान देना चाहिए था वह नही दिया जा सका। मंत्री अपने निजी स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं। उन पर लगाम कसने में प्रधानमंत्री विफल रहे हैं।
आई पी एल में मंत्रियो का निजी स्वार्थ किसी से छिपा नही है। कृषि मंत्री किसानों के हित छोड़ कर क्रिकेट की पिच पर चौके छक्के मारते नज़र आ रहे हैं। जब तक किसानों की दशा को नही सुधारा जाएगा और कर्ज में डूबे किसानों की आत्महत्या की प्रवृत्ति को रोक कर आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए योजनाओं पर कारगर अमल शुरू नही होगा, तब तक सामाजिक बराबरी मुश्किल है। सामाजिक बराबरी तब होगी, जब विकास बड़े शहरों से निकल कर छोटे शहरों, कस्बों और गांवो में पहुंचेगा।
आजादी के 64 साल बाद भी जनता गांव से शहर में आ रही है क्योंकि गांव और दूरदराज के इलाके विकास से कोसों दूर हैं। दिल्ली में मिलने वाली बिजली, पानी की सुविधा, राजधानी के 25 से 50 किलोमीटर बाद नज़र नही आती है, इसलिए चहुंमुखी विकास के जरिए ही उत्थान हो सकता है।


(यह पत्र सरिता अगस्त (प्रथम) 2010 अंक में प्रकाशित हुआ)