Monday, 18 April 2016

जनगणना में जाति


संपादकीय टिप्पणी 'जनगणना में जाति' में आपके विचार एकदम ठीक हैं। जनगणना में जाति सिर्फ वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित है। आज का राजनीतिक समीकरण बेहद जटिल है क्योंकि राष्ट्रीय दल अपने बलबूते पर सरकार बनाने में असफल हैं। उन्हें छोटे छोटे दलों का सहारा लेना पड़ता है, जिस के तहत उन की मनमानी भी सहनी पड़ती है।
छोटे दल जाति और खास क्षेत्र से संबंध रखते हैं, जिस कारण जाति का महत्त्व वोटों पर पकड़ रखने के लिए जरुरी हो गया है। वर्ना आजादी के बाद देश की साक्षरता बढ़ी है और पढ़ने के बाद हमारी सोच बदलनी चाहिए लेकिन अफ़सोस कि हम सिर्फ डिग्री के लिये पढ़ रहे हैं। हमारी डिग्रियां बढ़ती जा रही हैं और मानसिकता संकीर्ण हो रही है।
जनगणना में जाति का शिगूफा सिर्फ वोट बैंक की देन है। जाति में क्या रखा है, मजदूर कितने हैं? कितने दिहाड़ी पर काम करते हैं? बेरोजगार हैं तो किस कारण से ताकि जनता की कठिनाइयां दूर करने के प्रयास करने में आसानी हो। सरकार को श्रमिकों, किसानों की समस्याएं नज़र नही आ रही हैं। जाति की गणना से कौन सी समस्या का समाधान होगा, सरकार को इस का स्पष्टीकरण जरूर देना चाहिए।


(यह पत्र सरिता, जुलाई(द्वितीय) 2010 में प्रकाशित हुआ।)