Sunday, 10 April 2016

ठाकरे की हार


एक फ़िल्म के प्रदर्शन को रुकवाने में असफल बाल ठाकरे एंड कंपनी को अपनी हार स्वीकार कर लेनी चाहिए। जनता उनकी धमकियों की परवाह किए बिना फ़िल्म देखने आई। इसमें क्षेत्र और भाषा के नाम पर मुम्बई को देश से अगल करने वाले ठाकरे का मंसूबा चकनाचूर हो गया। उन्होंने गलत मुद्दे उठाकर अपनी पार्टी को ही नुकसान पहुंचाया है। देश के अन्य हिस्सों के लोगों की तरह ही मुम्बई के लोगों को भी ज्यादा चिंता उनकी रोजी-रोटी की है। ऐसे में उन्हें कोरे नारों और स्वार्थ की राजनीति से बहुत देर तक बरगलाया नही जा सकता है। बाल ठाकरे एंड कंपनी को यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाए, उतना उनके लिए अच्छा होगा।

(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 22 फरवरी 2010 को प्रकाशित हुआ।)