Wednesday, 2 March 2016

अन्यायी क़ानूनी ढांचा


संपादकीय टिप्पणी 'अन्यायी क़ानूनी ढांचे में सजा' पढ़ी, एकदम सटीक लगी। आज न्यायलयों में लाखों मुकदमे विचाराधीन हैं, जिन का फैसला आने में वर्षों लग जाते हैं। 'दादा ख़रीदे पोता बरते' की तर्ज पर दादा के द्वारा दायर मुकदमे की त्रासदी बच्चों और पोतों को झेलनी पड़ती है।
न्यायलयों का चक्कर लगाना भी सजा से कम नही है। झूठी प्रशंसा और विरोधियों को फंसाने के लिए मुक़दमे दायर करना आम हो गया है। इन सबसे छुटकारा पाने के लिए सरकार को न्याय प्रक्रिया में अभूतपूर्व परिवर्तन करने पड़ेंगे। सरकार को समय सीमा तय करनी पड़ेगी कि मुकदमा दायर करने के 2 या 3 वर्ष के अंदर फैसला करना होगा। तभी न्यायाधीश भी लम्बी तारीखे न दे कर फटाफट फैसला करेंगे, जिससे झूठे मुक़दमों की संख्या कम हो सकेगी।
साथ ही यह व्यवस्था भी हो कि मुकदमा दायर करते समय मुकदमें से सम्बंधित सभी सबूतों को संलग्न करना जरुरी हो, जिस के आधार पर पहली 1-2 तारीखों पर ही यह निर्णय लिया जा सके कि मुक़दमा वाजिब है या ख़ारिज करने योग्य है।
इससे ही ऊटपटांग मुकदमों को दायर करने का प्रचलन बन्द होगा और न्याय प्रक्रिया कारगर साबित होगी।

(यह पत्र सरिता अक्टूबर (प्रथम) 2007 में प्रकाशित हुआ।)