Sunday, 14 February 2016

परवेज़ मुशर्रफ


लेख 'परवेज़ मुशर्रफ की किताब' नवम्बर (प्रथम), 2006 पढ़ा। लेखक ने मुशर्रफ की पुस्तक को आधे सच आधे झूठ का पुलिंदा बताया गई। यह एक मानव प्रवृति है कि अपनी हर चीज़ को सच बताने की हर संभव कोशिश करता है, जो मुशर्रफ ने की। चाहे मुशर्रफ ने पुस्तक में सरासर झूठ लिखा हो लेकिन आने वाले समय में यह पुस्तक एक इतिहास बन सकती है।
भारत सरकार यदि पुस्तक को गलत समझती है तो उसे अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट में चुनौती देनी चाहिए। यदि पुस्तक के तथ्य सही हैं तो भारतीय जनता को सरकार ने गुमराह क्यों किया? इस का स्पष्टीकरण सरकार को देना चाहिए क्योंकि हम अब तक कारगिल में भारत की जीत समझ रहे थे। सरकार को किसी भी सूरत में इस पुस्तक को हलके ढंग से नहीं लेना चाहिए।


(यह पत्र सरिता, दिसंबर (द्वितीय) 2006 में प्रकाशित हुआ।)