Thursday, 11 February 2016

चैंपियंस ट्रॉफी में हार


चैंपियंस ट्रॉफी में भारत की हार कोई नई बात नहीं है। भारतीय टीम 2006 से ज्यादातर एक दिवसीय मैचों में लगातार हारी है। यह सिलसिला वर्ष के शुरू में वेस्ट इंडीज दौरे से शुरू हुआ था और आज भी जारी है। गुरु ग्रेग के सभी प्रयोग असफल रहे हैं। विश्व कप के लिए उन्होंने जिस विजन की बात की थी, वह मिनी विश्व कप यानि चैंपियंस ट्रॉफी में ही चकनाचूर हो गया। हर टीम में एक-एक करके पुराने खिलाडियों के स्थान पर नए खिलाडियों को स्थान दिया जाता है, लेकिन ग्रेग चैपल ने लगभग सभी अनुभवी खिलाडियों को टीम से बाहर कर दिया। नतीजा हमारे सामने है। सवाल यह उठता है कि यदि लगातार ऐसा ही निराशाजनक प्रदर्शन करना है, तो महंगे विदेशी कोच की क्या ज़रूरत है। यह काम तो बिना कोच के या हिंदुस्तानी कोच के रहते भी हो सकता है। यही हाल रहा तो हमारी टीम बांग्लादेश और ज़िम्बाब्वे को छोड़कर दूसरी टीमों से नीचे आ जाएगी। कहीं गुरु ग्रेग का हिडन विजन भारतीय टीम को पतन के कगार तक पहुंचना तो नहीं? सवाल बचकाना है, मगर फिलहाल तो ऐसा ही होता दिखाई दे रहा है।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 6 नवम्बर 2006 को प्रकाशित हुआ।)