Sunday, 31 January 2016

ताश के महल में दरारें


संपादकीय के अंतर्गत टिप्पणी 'ताश के महल में दरारें' पढ़ी। यह एकदम सही है कि शेयर बाजार एक बिना सिद्धान्तों पर चलने वाला बाजार है जहां शेयर की कीमतें कंपनी के मुनाफे पर कम, बाहरी ताकतों की वजह से अधिक निर्धारित होती हैं।
बाहरी ताकतों में सट्टा प्रमुख है जिन में कभी-कभी कंपनियां भी शामिल होती हैं। शेयर बाजार का इतिहास बारबार सिर्फ एक बात को दोहराता है कि अब समय आ गया है कि इस का नाम बदल कर सट्टा बाजार रख दिया जाए।
जब शेयर बाजार उछलता है तो सभी खुश हो जाते हैं लेकिन नीचे गिरने पर हमें हर्षद मेहता और केतन पारीख जैसे कांड याद आ जाते हैं कि हेराफेरी ही बाजार का मूलमंत्र है। जब रेट गिरते हैं तब बाजार इसे टेक्निकल करेक्शन कहता है, यह करेक्शन आम आदमी को पूरी तरह निचोड़ लेता है। इसलिए शेयर एक्सपर्ट कहते हैं कि शेयर बाजार में कूदने से पहले बाजार की पूरी जानकारी प्राप्त कर लें।
आम आदमी के लिए मेरा मानना है कि बैंकों जैसी सुरक्षित जमा योजनाओं की कम ब्याज वाली स्कीमों पर ही भरोसा करना चाहिए।

(यह पत्र सरिता, सितम्बर (प्रथम) 2006 में प्रकाशित हुआ।)