Sunday, 31 January 2016

हमारे नेताओं का ज्ञान


बहुत ही दुःख की बात है कि हमारे नेताओं और सांसदों को देश की स्वतंत्रता, स्वाधीनता के बारे में कुछ नहीं मालूम है, उनका मतलब 15 अगस्त को सिर्फ झंडा फहराने तक सीमित है। उन्हें राष्ट्रपिता गांधी का पूरा नाम तक नहीं मालूम, झंडे के रंगों का मतलब नहीं मालूम। जो एक छोटा बच्चा जनता है उसे हमारे नेता नहीं जानते, क्योंकि हमारे अधिकांश सांसद पढ़े-लिखे नहीं हैं। हमारे युवा आज राजनीति को अच्छा नहीं समझते हैं, इसी कारण 1952 में जहां 25 से 40 साल के 26 फीसदी सांसद थे। आज वर्तमान लोकसभा में घटकर केवल 13 फीसदी रह गए हैं। जिस अनुपात में शिक्षा में विस्तार हुआ है, उस अनुपात में पढ़े-लिखे सांसद नहीं बढे। 1952 की लोक सभा में 85 पोस्ट ग्रेजुएट सांसद थे, जो आज की लोक सभा में 147 तक ही पहुंच पाए हैं। यह इस कारण है कि क्रिमिनल बैकग्राउंड के सांसद लोकसभा में पहुंच रहे हैं। आज हमारी राजनीति पार्टियां टिकट देते समय शिक्षा के बजाय क्रिमिनल बैकग्राउंड को अधिक महत्त्व देती हैं। संसद के काम को ठीक से चलाने के लिए संसद में उपस्थिति अनिवार्य होनी चाहिए और छुट्टी पर जाने से पहले एप्लीकेशन की मंजूरी होनी चाहिए। जिस सांसद की उपस्थिति 67 प्रतिशत से कम हो, उसे अगले चुनावों के लिए अयोग्य घोषित कर देना चाहिए। तभी हमारे सांसदों का स्तर सुधरेगा।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 28 अगस्त 2006 की प्रकाशित हुआ।)