Thursday, 28 January 2016

शिक्षा का स्तर


अब तक हम परीक्षाओं में पेपर लीक और नक़ल से वाकिफ थे, लेकिन मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में परीक्षा की कापियां जांचने के लिए दस-बारह वर्ष के सुकुमारों को नियुक्त किया जाना सबके लिए एक सदमे से कम नहीं। चंद पैसों की खातिर छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना एक दंडनीय अपराध माना जाना चाहिए। जिस तरह विश्वविद्यालय की साख गिरी है, उससे सवाल यह उठता है कि यह सब आखिर कब से हो रहा था। विश्वविद्यालय के प्रति छात्रों में भी अविश्वास को जल्दी दूर नहीं किया गया, तो इसके घातक परिणाम हो सकते हैं। इतना तो होना ही चाहिए कि अब कापियां जांचने के काम को पारदर्शी बनाया जाए। जिस तरह परीक्षा देने के लिए सेंटर होते हैं, उसी तरह विश्वविद्यालय परिसर में परीक्षा कापियां जांचने का सेंटर होना चाहिए और अध्यापकों को उसी सेंटर में बैठकर पुस्तिकाएं जांचनी चाहिएं।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 24 अगस्त 2006 को प्रकाशित हुआ।)