Wednesday, 27 January 2016

कातिल स्कूलों की बसें


सोनीपत जिले में हुए स्कूली बस हादसे ने राज्य प्रशासन, स्कूल मैनेजमेंट और अभिभावकों - सभी को फिर से कटघरे में खड़ा कर दिया है। सबसे पहले तो स्कूलों को कॉन्ट्रैक्ट में बसों की सेवा लेने की बजाय अपनी बसें खरीद कर खुद ही बसों के रख रखाव की जिम्मेदारी लेनी चाहिए, क्योंकि कांट्रेक्टर मुनाफे के लिए बसें चलाते हैं और बच्चों की सुरक्षा की जरा भी जरा भी परवाह नहीं करते। स्कूल बसों के अलावा इन दिनों बच्चों को ढोने वाली ऐसी वैनों का प्रचलन भी चिंता का विषय है जिनमें एलपीजी किट लगी रहती है और घरेलू एलपीजी सिलिंडर पर चलती हैं। इनमें बच्चों को ठूंस-ठूंस कर बिठाया जाता है। लोग हादसों से नहीं सीखते हैं। इन वैनों का हाल यह है कि छोटे बच्चों को वैन का पिछला दरवाज़ा खोल कर सिलिंडर के ऊपर बिठाया जाता है। सिलिंडर को सीट बनाना खतरनाक है। अभिभावकों को देखना चाहिए कि उनके बच्चे किस किस्म की गाड़ियों में और किस तरह स्कूल ले जाए जाते हैं। राज्य प्रशासन को भी समय-समय पर यह जांच करनी चाहिए कि स्कूल बसों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर उसकी हिदायतों का पालन कर रहे हैं अथवा नहीं।

(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 11 अगस्त 2006 को प्रकाशित हुआ।)