Tuesday, 26 January 2016

मंहगाई का उबाल


यह दुःख का विषय है कि हमारे सांसदों को लोगों के दुःख दर्द की कोई चिंता नहीं है। उन्हें सिर्फ अपने फायदे नज़र आते हैं, जनता की सुध लेने की फुरसत नहीं होती। ये सांसद लाभ के पद से संबंधित बिल को लेकर जितने आतुर दिखाई देते हैं, वहीँ जनता के हक को लेकर वे उतने ही ठन्डे बने रहते हैं। मंहगाई के बारे में वित्त मंत्री से कुछ कहो तो वह मुद्रास्फीति दर की बात कर बात को टरका देते हैं। उनके लिए मुद्रास्फीति की दर नियंत्रण में होगी पर जनता के लिए मंहगाई अनियंत्रित होती जा रही है। हमें खुदरा यानी रिटेल मूल्यों पर नज़र डालनी चाहिए कि किस तरह जिंसों के खुदरा मूल्य आम आदमी के जीवन पर असर डालते हैं। सरकार को रिटेल मूल्यों को कम करने की ओर कोई निर्णायक कदम उठाने चाहिए, क्योंकि यही मूल्य रोज़मर्रा के जीवन में जनता पर भारी पड़ते हैं।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 10 अगस्त 2006 को प्रकाशित हुआ।)