Monday, 18 January 2016

बीमा कंपनियों की मनमानी


सरकारी बीमा कंपनियों का हेल्थ इंश्योरेंस के विषय में रुख एकदम गलत है। यदि सरकारी कंपनियां शुद्ध व्यवसायी की तरह सामाजिक दायित्व छोड़कर सिर्फ लाभ की कामना रखेंगी, तब निजी बीमा कंपनियों से क्या उम्मीद की जाए? 45 वर्ष की आयु से पहले आमतौर पर हेल्थ इंश्योरेंस की ज़रूरत नहीं पड़ती। यह एक विसंगति है कि जवान लोगों के हेल्थ इंश्योरेंस के लिए कंपनियां एड़ी चोटी का प्रयास करती हैं और रोज़ टेलीफोन कर उनका चैन हराम किए रहती हैं और जब 45 वर्ष के बाद हेल्थ इंश्योरेंस की ज़रूरत होती है, तब कन्नी काट कर निकल भागती हैं। मेडिकल पॉलिसी के नवीकरण और भुगतान में जान बूझ कर रोड़े अटकाए जाते हैं। सरकार ने सामाजिक दायित्व के मद्देनज़र हेल्थ इंश्योरेंस शुरू किया था। बीमा कंपनियों को यह समझना चाहिए कि बीमे का दूसरा नाम ही जोखिम है। जब जोखिम का व्यापार शुरू किया है तो उसे निभाना भी पड़ेगा। सरकार को अपनी बीमा कंपनियों पर लगाम कसनी पड़ेगी, ताकि वे अपने सामाजिक दायित्वों को लेकर लापरवाही न दिखाएं।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 29 जुलाई 2006 को प्रकाशित हुआ।)