Sunday, 10 January 2016

राष्ट्रपति का इशारा


राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने 'लाभ के पद' से सम्बंधित संशोधन विधेयक पार्लियामेंट को वापस भेज कर सारे राजनीतिक दलों को आइना दिखा दिया है। सरकार भले बिल पास करवा ले, मगर प्रेजिडेंट ने इस कदम के जरिए उस पर कठोर टिप्पणी की है। लगता है कि नि:स्वार्थ सेवा और राजनीति देश को आजादी के साथ ही विदा ले चुकी है। आज सिर्फ स्वार्थ की राजनीति चारों तरफ फ़ैल चुकी है, तभी सारे सांसदों ने खुले दिल से लाभ के पदों की परिभाषा ही बदल दी। इस मसले पर विभिन्न विचारधाराओं वाले दल एक ही सुर में बोलने लगे हैं। सवाल यह है कि देश की सेवा के लिए क्या लाभ का पद जरुरी है? सांसद और विधायक लाभ के लिए कोई भी व्यवसाय कर सकते हैं, लेकिन उस व्यवसाय में कुर्सी की ताकत की कमी होती है, इसलिए कुर्सी की ताकत के साथ लाभ का पद सोने पे सुहागे का काम करता है। समय की मांग थी कि एमपी और एमएलए स्वयं सरकारी पदों से दूर रहने की पहल करते, लेकिन उन्होंने इसके ठीक उलट किया।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 2 जून 2006 को प्रकाशित हुआ।)