Thursday, 10 December 2015

अवैध निर्माण


संपादकीय के अंतगर्त 'अवैध निर्माण पर कानून का बुलडोज़र' शीर्षकयुक्त टिप्पणी पढ़ी। यह एकदम सही है कि बुलडोज़र चलने से सिर्फ जनता ही पिसी, किसी भी राजनीतिबाज और अफसर का बाल भी बांका नहीं हुआ। जबकि समस्या की जड़ ये दोनों ही रहे हैं।

इस पूरे मसले में राजनीतिबाज़ो ने सिर्फ घड़ियाली आंसू ही बहाए हैं। यदि ये जनता के सच्चे हमदर्द होते तो शायद किसी को नुकसान पहुंचता। वास्तव में देखा जाए तो अवैध निर्माणों और रिहायशी फ्लैटों को कमर्शियल बनाने के पीछे मुहीम तब तेज हुई जब डीडीए ने कमर्शियल निर्माण बंद करके सिर्फ भूखंड बेचने शुरू किये। बिल्डर्स को चिंता हुई कि अगर फ्लैटों का कमर्शियल तौर पर प्रयोग होता रहा तो उनके मॉल्स और दुकानों को कौन खरीदेगा जिनका रेट अधिक है। यही से राजनीती शुरू हो कर बुलडोज़र पर सीमित हो गई। यह बड़े दुःख का विषय है कि आज भी दिल्ली सरकार न तो कोई नियम बना सकी है और न ही कोर्ट में सीधे जा कर जजों से बात कर पाई ताकि जनता को समस्या से मुक्ति मिल सके।


(यह पत्र सरिता अप्रैल (द्वितीय) 2006 में प्रकाशित हुआ।)