Sunday, 15 November 2015

बाजार का हित


साल दर साल वैलेंटाइन्स डे पर तडक-भड़क बढ़ती जा रही है। इस त्यौहार की शहरों में बढ़ती लोकप्रियता के पीछे शुद्ध व्यावसायिकता है। जब से उदारीकरण की शुरुआत हुई है, मीडिया खासतौर से टीवी चैनलों की मार्फ़त इसे प्रचारित किया गया है। एक दशक पहले इसे कोई नहीं जानता था। हमारे देश में पहले सिर्फ बाल दिवस और टीचर्स डे ही मनाए जाते थे। आज व्यावसायिकता की आंधी में दोनों महत्वहीन हो गए हैं।वैलेंटाइन्स डे के साथ-साथ बाजार ने मदर डे, फादर डे, सिस्टर डे, ब्रदर्स डे को भी बढ़ावा दिया है। इसी तर्ज़ पर अगर चाचा, चाची, मौसी, फूफा, मामा, मामी डे भी शुरू हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। वैलेंटाइन्स डे एक आदमी का मुद्दा नहीं है, क्योंकि आज आम आदमी बिजली, पानी, टैफिक, ऑफिस और दूसरे रोज़मर्रा के कार्यों में व्यस्त होता है। असल में समस्याओं से भरा हर दिन एक समान है। वैसे भी प्रेम के प्रतीक वैलेंटाइन्स  के लिए साल में एक दिन ही क्यों? भारतीय संस्कृति में प्रेम का खास महत्त्व है, उसके लिए सारे दिन बराबर हैं। प्रेम का इज़हार सिर्फ एक दिन का मोहताज नहीं है। इसके लिए तो कभी पूरा जीवन भी कम पड़ जाता है। प्रेम का संचार हर दिल में होना चाहिए, ताकि समाज में नफरत गायब हो जाए और प्रसन्नता की खुशबु चारों तरफ फैले।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 17 मार्च 2006 को प्रकाशित हुआ।)