Sunday, 15 November 2015

अदालत भी कटघरे में

'अदालत भी कटघरे में' शीर्षक युक्त संपादकीय टिप्पणी एकदम उचित लगी। सचमुच अदालतों को भी अपना रवैया बदलना चाहिए, जहां लोग न्याय के लिये आते हैं और खुद तारीखों में उलझ जाते हैं। यदि सरकार नई अदालते नहीं बनाती है तो अदालतों को अपनी परंपरा बदलनी चाहिए और आंखें मूंद कर तारीखें नहीं डालनी चाहिए।


हर मामले के फैसले के लिए निश्चित समय सीमा होनी चाहिए ताकि कोई भी मुकदमा लंबा न खिंचे। मुकदमा लंबा खिचने से एक तरह से कानून का क़त्ल हो जाता है।

अदालतों को चाहिए कि वे खुद ही समय सीमा निर्धारित करें। एक मुक़दमे की अधिकतम सीमा 2 साल से अधिक नहीं होनी चाहिए ताकि कोई बेगुनाह तारीखों के चक्कर में परेशान न हो। मुकदमा दायर करने वाले को सबूत और बयान केस के साथ ही लगाने चाहिए ताकि अदालत का समय व्यर्थ न हो और शीघ्र न्याय मिल सके।


(यह पत्र सरिता फरवरी (दिव्तीय) 2006 अंक में प्रकाशित हुआ।)