Monday, 26 October 2015

आरक्षण बनाम वोटों की राजनीति


लेख 'आंध्र प्रदेश मुस्लिम आरक्षण अधिनियम हाई कोर्ट द्वारा रद्द' पढ़ा। यह प्रकरण सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमें अभी भी आरक्षण की आवश्यकता है? आजादी के बाद आरक्षण का उद्देश्य केवल सीमित समय तक लागू करना था ताकि पिछड़ा वर्ग देश की मुख्य धारा से जुड़ सके।
आज़ादी के 5 दशकों बाद आरक्षण अपने मूल सिद्धान्त से भटक कर वोटों की राजनीति में उलझ कर रह गया है।
सरकार को धर्म और जाति के आधार पर आरक्षण समाप्त करना चाहिए। यदि 58 वर्षों में आरक्षण के आधार पर पिछड़े वर्ग को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने में हम असमर्थ रहे हैं तो आने वाली कई पीढ़ियों तक देश इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकेगा।
सरकारी नौकिरयों में आरक्षणकी बात की जाती है, उस के लिए न्यूनतम शिक्षा जरुरी है जिस से पिछड़ा वर्ग वंचित है।
सरकार इस दिशा में कोई कदम नहीं उठा रही कि सरकारी नौकरी के लिए न्यूनतम शिक्षा का उचित प्रबंध करे।
सरकार मूल उद्देश्य से भटक कर वोट बैंक को मजबूत करने के लिए आरक्षण का पासा फैंकती है। यदि कमजोर वर्ग शिक्षित होगा या कम शिक्षित वर्ग के लिए ग्रामीण रोजगार की कोई कारगार योजना होगी, तब उनकी आर्थिक स्थिति स्वयं सुधर जाएगी और ऐसी स्थिति में किसी को भी आरक्षण की ज़रूरत नहीं होगी।
सरकार यह अच्छी तरह जानती है कि पिछड़े वर्ग की आर्थिक स्थिति सुधरने पर वोट बैंक हाथ से फिसल जायेगा, इसलिए वह इन की शिक्षा के लिए कोई कारगार योजनाएं लागू नहीं करती।

(यह पत्र सरिता फरवरी (प्रथम) 2006 अंक में प्रकाशित हुआ।)