Friday, 30 October 2015

जेब भरो अभियान


12 फरवरी को 'फोकस' के तहत प्रकाशित अपनी टिप्पणी में प्रो. सुधीश पचौरी ने वैलेंटाइन्स डे का औचित्य सिद्ध करने की कोशिश की। सच पूछा जाए तो यह केवल बाज़ारवाद की देन है। आज मल्टीनेशनल कंपनियों के प्रचार से युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित हो रही है। मदर्स डे, फादर्स डे और न जाने कितने डे हम मनाने लगे हैं जबकि हाल तक किसी ने इनके बारे में सुना तक न था। किसी प्रियजन से प्यार का इज़हार करने के लिए हम किसी विशेष 'डे' की प्रतीक्षा क्यों करें? हर तीसरे-चौथे दिन को किसी विशेष दिवस के रूप में मनाने का प्रचार केवल विदेशी कंपनियों का जेब भरो अभियान है।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 22 फरवरी 2006 को प्रकाशित हुआ।)