Friday, 2 October 2015

सेंसेक्स का सच


सेंसेक्स को अर्थवयवस्था का बैरोमीटर कहा जाता है और आज इसी के आधार पर अर्थव्यवस्था की सेहत का अंदाज़ा लगाया जाता है। भारत आज भी कृषि प्रधान देश है और हमारे देश की 70 फीसदी जनता ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, जिसका शेयर बाजार से कोई लेना देना नहीं है। सेंसेक्स के उतार चढ़ाव से उसके जीवन में कोई फर्क नहीं पड़ता है, अत: सेंसेक्स को इकॉनमी का बैरोमीटर कहना अनुचित है। शहरों में भी आम जनता अभी शेयर बाजार से दूर है और लघु निवेशकों का इससे कोई सरोकार नहीं है। इसीलिए सेंसेक्स का महत्त्व सिर्फ वित्तीय संसाधनों या सटोरियों तक ही सीमित है। शेयर बाजार में पारदर्शिता बहुत जरुरी है। इनसाइड ट्रेडिंग के कारण लघु निवेशक नुकसान में रहते हैं, क्योंकि खुद सरकार भी अपनी इकाइयों के माध्यम से बहती गंगा में हाथ धोने को तत्पर रहती है। इसका जीता जागता उदहारण पंजाब नेशनल बैंक है, जिसने पूंजी बाजार में उतरने से पहले शेयरों की कृत्रिम तेजी बनाई और बाद में हाथ खींच लिए, जिस कारण लघु निवेशकों को घाटे में रहना पड़ा।

(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 9 फरवरी 2006 को प्रकाशित हुआ।)