Monday, 6 July 2015

शेयर बाजार में तूफ़ान


संपादकीय टिप्पणी 'शेयर बाजार में तूफ़ान' पढ़ी। यह एकदम वाजिब है कि शेयर मार्किट का अपना कोई अस्तित्व नहीं है। इसे अगर हवा मार्किट कहें तो उचित होगा। शेयर बाजार का इतिहास दर्शाता है कि बाजार सारे सिद्धान्तों की बलि चढ़ा कर सिर्फ सट्टेबाज़ी और इनसाइड ट्रेडिंग के सहारे ही चलता है।
किस शेयर का क्या रेट होना चाहिए, इस का निर्धारण कंपनी की वित्तीय स्थिति और भविष्य की योजनाओं पर आधारित होना चाहिए। लेकिन शेयर बाजार में केवल भविष्य के अनुमान के आधार पर ही रेट ऊपर नीचे होते रहते हैं।
सूचकांक का नीचे गिरना मात्र टेक्निकल करेक्शन के नाम पर टाल दिया जाता है। जब आम निवेशक शेयर बाजार में लिप्त होता है तो सटोरिये पूंजी का घोटाला कर देते हैं, इस का नतीजा कभी हर्षद मेहता तो कभी केतन पारीख कांड जनम लेते हैं। पिछले 2 दशकों का शेयर बाजार इस बात का गवाह है कि कंपनियों के परिणामों का महत्व कम है जबकि इनसाइड ट्रेडिंग का असर अधिक है। इसीलिए शेयर बाजार में पूंजी लगाने वालों का अनुपात देश की आबादी के हिसाब से शून्य है।

यह पत्र सरिता दिसंबर (प्रथम) 2005 में प्रकाशित हुआ।