Monday, 20 July 2015

शिक्षा प्रणाली


लेख 'नई शिक्षा प्रणाली : क्या वाकई है समाधान' नवम्बर (द्वितीय) पढ़ा। इसमें आपने सामयिक विषय उठाया है। वास्तव में कोई खास समाधान नहीं मिल पाएगा। बोर्ड की परीक्षाओं में हर अभिभावक अपने बच्चे को तनाव में डालता है, ताकि उन का बच्चा अधिक नंबर ला कर नामी गिरामी कॉलेजों में प्रवेश पा सके।
बच्चे भी यही सोचने को बाध्य हो जाते हैं कि उनका भविष्य केवल अधिक नंबर लाने और अच्छे कॉलेज में प्रवेश से ही सुरक्षित हो सकता है। लेकिन वास्तविकता इस के विपरीत है।
ज़िन्दगी के लंबे सफ़र में सफलता का राज है मेहनत और कर्तव्यपरायणता। यदि हम उद्योगपतियों की सफलताओं को देखें तो उस के पीछे शिक्षा नदारत है। उन्होंने अपनी लगन, सूझबूझ और कर्तव्यपरायणता से मंजिल पाई है। लेकिन उच्च शिक्षा प्राप्त विदेशों से लौटे बच्चे आपस में लड़झगड़ कर बटवारे करते दिखाई पड़ते हैं। आज की शिक्षा वास्तव में दोषपूर्ण है। हमें इसे व्यावहारिक बनाना चाहिए, जिससे जीवन की समस्याओं को हल करने का समाधान ढूंढा जा सके। नंबरों के आधार पर ग्रेड प्रणाली की शुरुआत तो महज कॉस्मेटिक सर्जरी की तरह से होगी। इस प्रणाली में भी बच्चों पर अच्छे ग्रेड लाने के लिए दबाव तो रहेगा ही।


(यह पत्र सरिता, जनवरी (प्रथम) 2006 अंक में प्रकाशित हुआ।)