Sunday, 12 July 2015

गरीबों के नाम पर


संपादकीय टिप्पणी 'गरीबों के नाम पर अस्पताल पर शिकंजा' पढ़ी। इस बारे में मेरा मत है कि जब अस्पताल कम मूल्यों पर सरकार से जमीन ले कर अपना व्यवसाय शुरू करते हैं और मुनाफा कमाते हैं तब भी गरीबों का रियायती दर पर इलाज़ नहीं करते हैं। कई बार तो मोटी रकम लेने के बाद भी इलाज़ में कोताही बरती जाती है। और तो और अस्पताल वाले मुनाफे के बावजूद आयकर नहीं देते हैं।
इस दशा में यदि अस्पताल को मुनाफे पर किसी और को बेचा जाता है तब उस मुनाफे पर आयकर की शर्तों के आधार पर सरकार को हिस्सा देना उचित है।
इस मामले में मुश्किल यह है कि सरकार पूरे देश की मालिक है और लीज के नियमों के आधार पर भूमि का आवंटन किया जाता है। भूमि को बेचने के लिए नए तरीकों का इस्तेमाल होता है। सरकार सब कुछ देखते हुए भी कुछ नहीं कर पाती है, तो जाहिर है इस में भ्रष्टाचार की प्रमुख भूमिका है।
उचित यही है कि सरकार को फ्रीहोल्ड आधार पर भूमि का आवंटन करना चाहिए, ताकि बाद में किसी प्रकार के झगडे की आशंका न रहे।


(यह पत्र सरिता दिसंबर (दिव्तीय) 2005 अंक में प्रकाशित हुआ।)