Wednesday, 10 June 2015

क़र्ज़ का मकड़जाल


उदारीकरण के दौर में उपभोक्तावाद का जनम हुआ। पहले की तुलना में आज युवा वर्ग की कमाई ज्यादा है। आमदनी के साथ सभी ज़रूरी वस्तुओं का बाजार में अंबार लगा हुआ है। बस ख्वाहिश कीजिये और सामान हाज़िर है। इसके साथ निजी बैंकों द्वारा क़र्ज़ आसानी से मिलने के कारण भी ख्वाहिशों का अंत नहीं होता है। पहले लोग अपनी आमदनी का कुछ हिस्सा बचाया करते थे, लेकिन आज के आसान क़र्ज़ ने जीने का अंदाज़ बदल दिया है। बचत की बजाय हम क़र्ज़ लेकर सभी ख्वाहिशों को पूरा करते हैं। क़र्ज़ लेते समय हम अक्सर भूल जाते हैं कि उसे वापस भी करना है। कितना क़र्ज़ हम लेकर वापस कर सकते हैं, इस विषय पर विचार कठिन है। आज के बैंक वास्तव में पुराने ज़माने के साहूकार हैं, बस रूप बदल गया है। इनके चक्रव्यूह से हम तभी बच सकते हैं जब हम अपनी इच्छाओं पर काबू करना सीखेंगे। अपनी इच्छाओँ पर नियंत्रण रखकर ही हम इस चक्रव्यूह से बच सकते हैं। जरुरत के समय क़र्ज़ लेना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन लोन उतना ही लेना चाहिए जितने का भुगतान अपनी आमदनी से आसानी से कर सकें। क़र्ज़ के साथ बचत पर भी ध्यान देना चाहिए, तभी हम अपने खुद के बनाए मकड़जाल से बच सकते हैं।

(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 15 नवम्बर 2005 को प्रकाशित हुआ।)