Thursday, 28 May 2015

भ्रष्टाचार का रावण


हर साल की तरह इस बार भी देश भर में हर्षोल्लास के साथ दशहरा मनाया गया। हम पाप और बुराई के प्रतीक रावण का अंत उसका पुतला जलाकर करते हैं और दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन करते हैं। आज देश में भ्रष्टाचार मकड़ी की जाले की तरह फैला हुआ है जो देश और जनता की उन्नति की राह का रोड़ा है। क्या हम भ्रष्टाचार का दहन नहीं कर सकते? क्या रिश्वतखोरी का विसर्जन नहीं कर सकते? हर वर्ष हम दशहरे के दिन सिर्फ पुतले जला कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं, लेकिन कलयुग के रावण भ्रष्टाचार को फलने फूलने के लिए छोड़ देते हैं। अफ़सोस की बात है कि भ्रष्टाचार रूपी रावण  का अंत करने कोई भी राम आगे नहीं आ रहा है। सीबीआई के छापे भी इस रावण का कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे। छापों के बावजूद भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 20 अक्टूबर 2005 को प्रकाशित हुआ।)