Wednesday, 6 May 2015

हार के बाद


भारत की त्रिपक्षीय टूर्नामेंट में हार से निराशा ज़रूर हुई है लेकिन मायूसी नहीं क्योंकि भारतीय क्रिकेट टीम ऑस्ट्रेलिया जैसी शक्तिशाली कभी नहीं रही। जहां ऑस्ट्रेलिया की जीत का औसत 70 से 80 प्रतिशत है, वहीँ भारत की जीत का औसत मात्र 50 प्रतिशत है। 1983 में विश्व कप जीतने के 3 - 4 वर्षो तक टीम का प्रदर्शन अच्छा रहा जब टीम ने एक दिवसीय टूर्नामेंट जीते। क्रिकेट के इतिहास पर नज़र डालें तो हमें मालूम होगा कि भारतीय टीम ने कभी भी 10 - 15 मैच लगातार नहीं जीते। उसे तीन - चार मैच जीतने के बाद हार का सामना करना पड़ता है। नए कोच ग्रेग चैपल एकदम विफल रहे हैं, उन्होंने सिर्फ प्रयोग किए हैं। ग्रेग चैपल को पता होना चाहिए कि प्रयोग घरेलू अभ्यास मैचों में किया जाता है। टूर्नामेंट के हर मैच में प्रयोग यह दर्शाता है कि कोच की क्षमता की कमी है। जैसा प्रदर्शन भारतीय टीम ने किया है वैसा तो बिना कोच के भी वह कर सकती थी। फिर इतना महंगे विदेशी कोच की क्या ज़रूरत है। भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है। लेकिन उस प्रतिभा को बाहर लाने वालों की आवश्यकता है।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 20 अगस्त 2005 को प्रकाशित हुआ।)