Monday, 4 May 2015

जातियों के भंवर में फंसा बिहार

संपादकीय टिप्पणी 'जातियों के भंवर में फंसा बिहार' एकदम सही है। मूल प्रश्न अभी भी वही है कि क्या दोबारा चुनाव किसी दल को स्पष्ट बहुमत दिला सकेंगे? जहां बिहार के नेता अपनी प्रतिष्ठा के लिए अकड़ कर खड़े हैं वहीँ जनता बेबस अपनी जेबों को टटोल रही है क्योंकि दोबारा मतदान का खर्च आखिर निकलना तो जनता की जेब से है।
बिहार के जो नेता केंद्र में एक साथ यूपीए सरकार को सहयोग दे रहे हैं वोही नेता अपने प्रदेश में एक साथ चलने को तैयार नहीं क्योंकि वे बिहार को खानदानी जागीर समझते हैं कि मेरे अलावा दूसरा गद्दी पर क्यों बैठे? जब तक यह मानसिकता समाप्त नहीं होगी, बिहार का भला मुश्किल नज़र आता है। जान कल्याण के लिए अपनी मूंछ की प्रतिष्ठा को तो छोड़ना ही पड़ेगा।


(यह पत्र सरिता अगस्त (प्रथम) 2005 अंक में प्रकाशित हुआ।)