Tuesday, 26 May 2015

सरकारी उद्योग


संपादकीय टिप्पणी "सरकारी उद्योगों का असली चेहरा" एकदम सही है। सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह किन कारणों से मुनाफे वाले उद्योगों को बेचना चाहती है। एक बात तो तय है कि सरकार एक सफल व्यापारी कभी बन ही नहीं सकती क्योंकि सिर्फ उन्ही उद्योगों में सरकार मुनाफा कमाती है जहां उस का एकाधिकार है वरना बाकी उद्योग तो अपने आप बंद हो जाते हैं।
सरकार को एक स्पष्ट नीति बना कर घोषणा करनी चाहिए कि वह व्यापार से अगल हो रही है और सारी सार्वजानिक इकाइयों को एक समय सीमा तक बेच देगी ताकि किसी को कोई एतराज न हो। अब सवाल रहस वाम दलों का तो वे शोर इसलिए मचा रहे हसीन कि ट्रेड यूनियन पर से उन का कंट्रोल समाप्त हो जायेगा।
वास्तव में वामदलों ने यूपीए सरकार बनने के बाद सिर्फ शोर मचाया है, कोई रचनात्मक कार्य नहीं किया।


(यह पत्र सरिता, सितम्बर (प्रथम) 2005 अंक में प्रकाशित हुआ।)