Monday, 11 May 2015

महिलाओं का हक़


हिन्दू विरासत कानून में संशोधन के जरिए बेटियों को पैतृक संपति में बराबरी का हक़ देने का फैसला औरतों में सुरक्षा की भावना और मज़बूत करेगा, लेकिन इसके लिए लोकसभा को भी राज्यसभा की तरह व्यवहार करना पड़ेगा। यदि लोकसभा ने इस विधेयक को पास करके कानून नहीं बनाया तो यह साबित हो जाएगा कि हमारे नेताओं के दांत हाथी की तरह है, यानी दिखाने के और, खाने के और। वैसे भी इस कानून में कई कमियां हैं। इसके तहत खेती की भूमि को पैतृक संपति से बाहर रखा गया है। सरकार आनन फानन में अपनी छवि सुधारने में लगी हुई है। उसे महिलाओं की बराबरी का वास्तव  में कोई ध्यान नहीं है, क्योंकि त्रुटियों से भरपूर इस विधेयक पर राज्यसभा में कोई बहस नहीं हुई। सरकार को गैर हिन्दू महिलाओं का ध्यान क्यों नहीं आता है? जो सरकार संसद में महिलाओं को 33 प्रतिशत रिजर्वेशन देने में असमर्थ है, वह महिलाओं को बराबरी का हक़ दिलाएगी, यह विश्वास नहीं होता।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 26 अगस्त 2005 को प्रकाशित हुआ।)