Friday, 1 May 2015

गुड़गांव के प्रश्न

पिछले दिनों गुड़गांव में जो कुछ हुआ वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। इस मामले के दो पहलू हैं - एक तो मज़दूरों के प्रति पुलिस का व्यवहार और दूसरा श्रमिकों को लेकर प्रबंधन का रवैया। यदि खुले में पुलिस इतना अत्याचार कर सकती है तो थाने में वह क्या करती होगी, इसका अनुमान लगाने से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। राज्य सरकार को इस बात का ध्यान रखना चाहिए था कि बात न बिगड़े। आखिरकार हरियाणा के मुख्यमंत्री ने प्रबंधन और मज़दूरों के बीच समझौता कराया ही। अगर यह काम पहले हो गया होता तो ऐसी नौबत ही नहीं आती। अगर हमें विदेशी पूंजी निवेश को आमंत्रित करना है तो इसके लिए उपयुक्त माहौल बनाना होगा। विदेशी कंपनियों को हर तरह की सुविधा उपलब्ध कराने का यह मतलब नहीं है कि उन्हें हर मामले में मनमानी करने का अधिकार दिया जाए। मज़दूरों की अपेक्षाओं को भी पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। श्रम कानूनों में सुधार आवश्यक है, लेकिन सुधारों की आड़ में कानून एक तरफ़ा नहीं होना चाहिए। श्रम कानून ऐसे हों कि कोई भी एक पक्ष मनमानी न कर सके। दोनों पक्षों के समान अधिकार होने चाहिए। कोई विवाद हो तो सरकार तत्काल हस्तक्षेप करे और शांतिपूर्ण ढंग से मामले को निपटाए।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 4 अगस्त 2005 को प्रकाशित हुआ।)