Saturday, 18 April 2015

पीढ़ियों का टकराव


आज देश के बुजुर्गों की करीब 11 फीसदी आबादी अपने घरों में अकेले रहने को विवश हैं। गांवों में रोज़गार के साधन कम होने के कारण युवा शहरों में पलायन करते हैं और बुजुर्ग घरों में अपने व्यवसाय या खेती की देखभाल के लिए रह जाते हैं। शहरों में भी बुजुर्गों के अलग रहने के दो कारण हैं। पहला कारण है रोज़गार की तलाश में युवाओं का विदेश चले जाना, जिस कारण बुजुर्ग अकेले जीवन जीते हैं, क्योंकि विदेश की संस्कृति और सभ्यता अलग होने के कारण वे उसमें ढल नहीं पाते। दूसरा कारण बुजुर्गों का यह हठ है कि उम्र के इस पड़ाव में वे अपने बच्चों के अधीन नहीं रहेंगे। ऐसे बुजुर्गों के पास पर्याप्त धन सम्पति होती है। ये लूटपाट के शिकार आसानी से बन जाते हैं। इन्हें यह सोचना चाहिए कि वे भी कभी बच्चे या युवा थे। हर बच्चा गलत नहीं होता कि अपने मां-बाप को अकेला छोड़ दे। लेकिन समाज सारा दोष बच्चों पर मढ़ देता है। बुजुर्ग अपने हठ को नहीं छोड़ सकते हैं, दूसरी ओर बच्चे भी अपनी ज़िद पर अड़े रहते हैं। यही टकराव का कारण है।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 4 जून 2005 को प्रकाशित हुआ।)