Tuesday, 28 April 2015

चंदा यानी गोरखधंधा


सरिता जून (प्रथम) अंक में प्रकाशित संपादकीय 'चंदा यानी गोरखधंधा' बिलकुल सटीक है कि सूखा, बाढ़, तूफ़ान, भूकंप आदि पर राहत कार्य के लिए आम जनता भी अपनी बचत का एक हिस्सा राहत कोष में दान करती है लेकिन उसका सदुपयोग नहीं होता है। इस विषय में भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का कथन बारबार याद आता है कि मुश्किल से 15 - 20 फीसदी पैसा ज़रूरतमंदों के पास पहुंच पाता है और बाकी राहत बांटने वालों की जेब में चला जाता है। अब इन समाचारों को पढ़ कर कोई आश्चर्य या हैरानी नहीं होती बल्कि दुःख होता है। अभी एक समाचार यह कि सुनामी कहर के बाद अंडमान निकोबार में एक महिला को उस के नारियल पेड़ो के नुकसान पर केवल 2 रुपए का मुआवजा दिया गया जिसे उस महिला ने लेने से मना कर दिया। एक आम आदमी स्वयं जा कर ज़रूरतमंदों की मदद नहीं कर सकता है इसलिये अपनी बचत दान करता है और उस दान को राहत तंत्र खापी कर डकार भी नहीं लेता। यह वाकई दुःख की बात है।

(यह पत्र सरिता जुलाई (दिव्तीय) 2005 अंक में प्रकाशित हुआ।)