Monday, 27 April 2015

असली छापे

मई (प्रथम) के संपादकीय में 'असली छापे या नौटंकी' शीर्षकयुक्त टिप्पणी पढ़ी जोकि बिलकुल सही है। कुछ समय से भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए सरकारी कर्मचारियों पर छापे मारे जा रहे हैं और छिपी काली कमाई, सम्पति की घोषणा होती है लेकिन उन भ्रष्ट कर्मचारियों का उस के बाद क्या हुआ इस का खुलासा न तो सरकार करती है और न ही मीडिया।
वर्षो तक केस चलने पर सजा किसे मिली इस का रेकार्ड सरकार सार्वजानिक करे तब यक़ीन हो कि सरकार भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए कितनी वचनवद्ध है। इस से तो यही लगता है कि योजनावद्ध तरीकों से सरकार उन कर्मचारियों पर निशाना लगाती है जो उस की कार्यशैली में बाधक होते हैं।
यही वजह है कि छापों के साथ साथ भ्रष्टाचार अधिक फ़ैलता जा रहा है। सरकार चाहती ही नहीं कि कर प्रणाली सरल हो। खोखले दावे किये जाते हैं कि कर प्रणाली सरल हो गई है, लेकिन उलटे उस को और अधिक पेचीदा बना दिया जाता है। सर्विस टैक्स, फ्रिंज बेनिफिट टैक्स, वैट, विथड्रावल टैक्स से काला धन समाप्त नहीं होगा बल्कि भ्रष्टाचार अधिक काले धन को बढ़ावा देगा।


(यह पत्र सरिता जुलाई (प्रथम) 2005 में प्रकाशित हुआ।)