Saturday, 18 April 2015

काले धन पर रोना

संपादकीय टिप्पणी 'काले धन पर रोना' पड़ा। यह सही है कि काले धन पर हर वित्तमंत्री सिर्फ घड़ियाली आंसू ही बहाता है। वास्तव में इसे जड़ से खत्म करने के लिए कोई ठोस कदम आज तक किसी भी सरकार के वित्तमंत्री ने नहीं उठाए। कारण साफ़ है, यदि काला धन ही समाप्त हो जाएगा तो सरकार और सरकारी बाबुओं से डरने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी, इसीलिए करों की भरमार रखी जाती है और हर वर्ष उस में संशोधन करके कर प्रक्रिया जटिल बनाई जाती है ताकि जनता पर सरकार का खौंफ बना रहे।
इस श्रृंखला में इस बार वित्तमंत्री ने काले धन के नाम पर फ्रिंज बेनिफिट टैक्स और बैंक से पैसे निकालने पर टैक्स की मार थोपी है। ये दोनों कर एक तरह के व्यय कर हैं। जब उत्पाद, कस्टम, बिक्री और आयकर लगाए जाते हैं तो व्यय कर एकदम अनुचित है। सरकार को एक रास्ता चुनना होगा, आयकर या व्यय कर का। दोनों एक साथ काले धन को और बढ़ावा देंगे।


(यह पत्र सरिता मई (दिव्तीय) 2005 अंक में प्रकाशित हुआ।)