Sunday, 5 April 2015

नाराज़गी जताने का हक़

संपादकीय टिप्पणी "नाराज़गी जताने का हक़" में उचित कहा गया है कि लोकतंत्र में अच्छे लोग लुप्त हो गए हैं और ख़राब लोगों में से किसी एक को चुनने के लिए कई मतदाता तो वोट डालने ही नहीं जाते हैं। इसी कारण अक्सर 50-55 प्रतिशत से अधिक मतदान नहीं होता है। आज समय की मांग के अनुसार उम्मीदवारों के प्रति अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने के लिए 'किसी को मतदान नहीं' की सुविधा होनी चाहिए। यदि यह मत संख्या ज्यादा है तो सभी उम्मीदवारों को अगले चुनावों तक अयोग्य घोषित कर के दोबारा मतदान करवाया जा सकता है। हो सकता है कि इस प्रक्रिया से थोडा बहुत सुधार हो जाए।

आज के बदलते परिवेश में अधिकार के साथ नाराज़गी जताने का अधिकार भी जनता को मिलना चाहिये, ताकि राजनीतिक पार्टियों को पता चल सके कि जनता क्या सोचती है और उन के बीच उम्मीदवारों की छवि कैसी है।


(यह पत्र सरिता अप्रैल (प्रथम) 2005 अंक में प्रकाशित हुआ।)