Friday, 6 February 2015

विरासत के कानून


संपादकीय टिप्पणी 'विरासत के कानून' में यह बात ठीक कही गई है कि आज के बदलते परिवेश में कानून को वास्तविकता के नज़दीक लाने के लिए यदि उसे अधिक व्यवाहारिक करने की ज़रुरत है तो साथ ही हमें भी अपनी मानसिकता को बदलने की ज़रुरत है।
आज हमारे पास एक तरफ वसीयत का प्रावधान है तो दूसरी तरफ बिना वसीयत वालों के लिए भी कानून है। लेकिन अधिक संपति पाने के लालच में हम कानूनी दावपेंच में फंस करह जाते हैं।
एक तरफ बिरला समूह वसीयत को लेकर विवाद में है तो दूसरी तरफ अम्बानी परिवार बिना वसीयत के संपति बटवारे को लेकर विवाद में है। जब तक सारी संपति अपने पास रखने की मानसिकता को हम नहीं बदलेंगे ऐसे विवाद हमेशा बने रहेंगे। यह सही है कि कानून के साथ साथ इंसान की प्रवृति और स्वभाव में भी बदलाव की ज़रुरत है।


(यह पत्र सरिता मार्च(द्वितीय) 2005 में प्रकाशित हुआ।)