Friday, 6 February 2015

नोट बांटना रिश्वत नहीं रोज़गार है


लेख 'नोट बांटने के मामले में फंसे लालू यादव' पढ़ा। यह ठीक है कि नैतिकता और सैद्धान्तिक आधार पर वोटरों को नोट बांटना रिश्वत देने के समान है लेकिन आज जो हालात हैं उन में हमें अपनी सोच बदलनी पड़ेगी।
नेता तो सिर्फ चुनावों के समय ही मतदातायों के पास जाते हैं और उन्हें रिझाने की कोशिश करते हैं। इसीलिए आम जनता भी चाहती है कि चुनावों के समय ही इस तरह का फायदा उठा लिया जाए और अपने रुके कामों को भी करवाया जाए।
चुनावों में कम से कम एक माह तक रोज़गार मिल जाता है। यदि नोट बांटना गलत है तो रुपये दे कर रैली में भीड़ जुटाना भी गलत है क्योंकि सब को मालूम है कि रैली में जाने के लिए पैसा और राशन दोनों मिलते हैं। इसलिए बदलते परिवेश में नोट बांटना रिश्वत नहीं बल्कि इसे रोज़गार के रूप में देखना चाहिए।


(यह पत्र सरिता मार्च (प्रथम) 2005 में प्रकाशित हुआ।)