Friday, 6 February 2015

राज्यपाल की भूमिका


विभिन्न राज्यों में राज्यपालों के रवैये को देखकर ऐसा लगता है कि उन्हें अपने संवैधानिक दायित्वों से ज्यादा अपनी पार्टी की चिंता है। वे अपना कर्तव्य छोड़ कर पार्टियों के हितों के लिए सक्रिय हैं। यह सही है कि संविधान ने बहुत कुछ राज्यपालों के विवेक पर छोड़ दिया है, पर विवेक का इस्तेमाल करते समय गवर्नर को परंपरा का ध्यान रखना चाहिए। उन्हें इस बात की कोशिश करनी चाहिए कि उनके किसी कम से अनावश्यक विवाद न पैदा हो। गोवा और झारखण्ड में राज्यपाल की भूमिका बहुत संदिग्घ रही है।


(यह पत्र नवभारत टाइम्स में 10 मार्च 2005 को प्रकाशित हुआ।)