Friday, 12 December 2014

बलात्कारी को दी सजा

लेख नवम्बर (प्रथम) 'बलात्कारी को दी महिलाओं ने सजा ए मौत' यह सोचने पर मज़बूर करता है कि पुलिस और अदालत से नाउम्मीद हो कर महिलाओं द्वारा उठाया यह कदम क्या सही है? आखिर पुलिस और अदालतों का कर्तव्य क्या है? क्यों मुल्ज़िम जुर्म करके छूट जाते हैं और खुलेआम आतंक फैलाते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि सबूतों के अभाव में कानून प्रभावहीन है।
आम जनता द्वारा कानून को अपने हाथ में लेना तो हमें प्राचीन युग की ओर धकेल रहा है। यह सब होते हुए भी सरकार समेत पुलिस और अदालतों ने अपनी कार्यप्रणाली नहीं बदली जिस से समाज के कमज़ोर वर्ग को शीघ्र और सुगम तरीके से न्याय मिल सके। इस कारण अब पुलिस और अदालतों को अपने को बदलने का समय आ गया है अन्यथा आम जनता फ़िल्मी स्टाइल में न जाने कितने अपराधिऔं को खून के बदले खून का न्याय दिला देगी। इसलिए समय रहते सरकार जाग जाए तो अच्छा होगा।


(यह पत्र सरिता, दिसंबर (द्वितीय) 2004 अंक में प्रकाशित हुआ।)