Sunday, 23 November 2014

ओलिंपिक में भारत

संपादकीय टिप्पणी ओलिंपिक में भारत को एक पदकबिलकुल सही है कि सरकारी नीतियों के कारण भारत को मात्र एक पदक से संतोष करना पडा। सरकार न तो खेलों को प्रोत्साहित करती है और न ही खिलाडियों के रखरखाव और भविष्य पर कोई ठोस प्रयास करती है। इस का ताजा उदाहरण ओलिंपिक जाने से पहले खिलाडियों को दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में भेड बकरियों की तरह ठहराना था। जहां अफसर वातानुकूलित कमरों में  रह रहे थे वहीं खिलाडियों को ऐसे कमरों में ठहराया गया जहां हवा, पानी जैसी सुविधा भी नही थी। इस में खेल मंत्री सुनील दत को हस्तक्षेप करना पडा। दूसरा उदाहरण ओलिंपिक टार्च रिले है, जिल में भाग लेने के लिए भारत की जानी मानी एथलीट पी.टी.ऊषा को निमंत्रण तक नही भेजा गया। मीडिया ने जब इस मामले पर रोशनी डाली तो औपचारिकतावश निमंत्रण सिर्फ खानापूर्ति थी, जब रिले टीम फिल्मी सितारों से भरी पडी थी। प्रश्न यह है कि क्या फिल्मी सितारों ने ओलिंपिक में हिस्सा लेने जाना था। लेकिन फिर भी भारतीय एथलीटों ने अपने दम पर अच्छा प्रदर्शन किया। हांलाकि रजत पदक सिर्फ निशानेबाज राज्यवर्धन सिंह राठौड ने जीता, लेकिन टेनिस में चौथा स्थान और एथलेटिक में छठे, सातवां स्थान प्राप्त करना भी गौरव की बात है क्योंकि रिले टीम फाइनल में खेली, देखने योग्य बात यह है कि शीर्ष 8 स्थानों पर हमारे खिलाडी आए जोकि केवल व्यक्तिगत दम पर संभव हुआ है।

 

(यह पत्र सरिता, नवंबर (प्रथम) 2004 अंक में प्रकाशित हुआ)