Saturday, 8 November 2014

किसानों को सरकारी दान


संपादकीय टिप्पणी किसानों को सरकारी दानबिलकुल सही है। कृषि प्रधान देश भारत में किसानों की हालात सब से दयनीय हैं, जिस का मुख्य कारण सरकारी नीतियां हैं।
उद्धोग की तरह कृषि का भी आधुनिककरण जरूरी है। इस से कृषि संबंधी समस्याओं को दूर किया जा सकता है। आज उद्धोग जगत की समस्याओं के समाधान के लिए फिक्की और ऐसोचेम जैसे संगठन हैं लेकिन किसानों का ऐसा कोई संगठन देखने को नही मिलता। हां, नेताओं ने सत्ता तक पहुंचने के लिए किसानों को सीढी की तरह जरूर इस्तेमान किया है।
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी कभी जमीन से नही जुडे रहे लेकिन सत्ता की कुर्सी पर बैठने के बाद वह भी इस सच को जान गए थे कि विकास फंड का केवल 15-20 प्रतिशत हिस्सा ही गरीब व जरूरतमंद लोगों तक पहुंच पाता है बाकी 80-85 प्रतिशत सरकारी तंत्र बांट लेता है।
समय की मांग है कि किसानों की समस्याओं को दूर करने के लिए कॉरपोरेट कल्चर को लाया जाए जिस से कृषि उत्पादन के क्षेत्र में आधुनिक संयंत्रों का इस्तेमाल हो सके। साथ ही किसानों की समस्याओं को सरकार के सामने लाने के लिए एक व्यापक मंच भी हो। उन को यह स्वतंत्र अधिकार भी होना चाहिए कि वे अपना उत्पाद मंडियों से बाहर, जहां चाहें बेच सकें। जब एक उद्धोगपति अपना माल जहां चाहे बेच सकता है तो किसानों को भी इस तरह की आजादी दी जानी चाहिए जिस से उन की आर्थिक स्थिति सुधर सके।


(यह पत्र सरिता, सितंबर (प्रथम) 2004 अंक में प्रकाशित हुआ)