Friday, 24 October 2014

सेंसेक्स बाज़ार के मूड का थर्मामीटर


सम्पादकीय टिप्पणी 'सेंसेक्स बाज़ार के मूड का थर्मामीटर' सटीक है। सेंसेक्स विदेशी फाइनेंस कंपनियों और सट्टेबाजों पर टिका हुआ है और उन्ही के मूड का वास्तविक थर्मामीटर है। इसीलिए सरकार की कई कोशिशों के बाद भी आम और छोटे निवेशक शेयर बाज़ार से कोंसो दूर हैं।
किसी भी कंपनी के शेयर भाव उस की आर्थिक स्थिति पर आधारित होने चाहिए कि खयाली पुलावों पर। इस का एक छोटा सा उदहारण इस साल का आम बजट है। बजट में ट्रैक्टरों पर उत्पाद शुल्क हटा दिया गया। इस खबर से ट्रैक्टर कंपनियों के शेयर के भाव उछल गए जोकि केवल सट्टेबाजों के मूड पर आधारित है।
ट्रैक्टरों का इस्तेमाल कृषि में होता है और भारत में खेती वर्षा पर आधारित है जो इतनी अनिश्चित है कि भारत का किसान कभी खुशहाल हो ही नहीं सकता क्योंकि कभी तो उसे सूखा मार देता है और कभी बाढ़ का पानी उस का सब कुछ बहा कर ले जाता है। जब तक किसानो को आर्थिक फायदा नहीं होगा वे ट्रैक्टर खरीदने की स्थिति में नहीं हो पाएंगे। फिर तो ट्रैक्टरों की बिक्री नहीं बढ सकेगी और ही ट्रैक्टर कंपनियो को मुनाफा होगा। इस स्थिति में शेयर रेट का उछाल सिर्फ सट्टेबाजों तक ही सीमित है।


(यह पत्र सरिता अगस्त द्वितीय 2004 में प्रकाशित हुआ।)