Tuesday, 16 September 2014

दलबदल कानून

लेख दलबदल कानून को ठेंगा दिखाते राजनीतिबाज(मई, प्रथम) आज के नेताओं का चरित्र दिखाता है, इसलिए आज भी दलबदल कानून को ढीलीढाला और लचर सिर्फ अपने निजी स्वार्थ हेतु रखा हुआ है कि वक्त आने पर चंद सिक्कों और कुर्सी के लालच में दल बदला जा सके। इस बार लोकसभा चुनावों के नतीजों ने एक त्रिशंकु लोकसभा को जन्म दिया है। जोडजाड कर सरकार बना कर और उस के बाद छोटे दलों को तोडना और फिर अपनी सरकार चलाने के लिए लचर कानून ही राजनितिक दलों के काम आएगा। आज 21वीं सदी में मतदाताओं की जरूरत कोई राजनेता नहीं समझता है, उसे सिर्फ कुर्सी ही नजर आती है, इसलिए जो दल एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते, एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लडते हैं, चुनावों के बाद कुर्सी के लिए हाथ मिलाते हैं। आज जरूरत है दलबदल कानून को अधिक कठोर बनाने की, जिस के तहत कोई नेता मतदाताओं के जनादेश की अवहेलना न कर सके।


(यह पत्र सरिता, जून (द्वितीय) 2004 में प्रकाशित हुआ।)