Saturday, 30 August 2014

समाधान नही

सरकार ने जिन समस्याओं को सुलझाने के लिए बिजली का वितरण निजी कंपनियों को सौंपा, वे आज भी बनी हुई हैं। यदि निजी कंपनियां इनमें कोई सुधार नहीं कर सकती हैं तो उन्हें चुपचाप वितरण के क्षेत्र से हट जाना चाहिए। मुश्किलों का हल निकाले बगैर बिजली की दरों में हर वर्ष वृद्धि अनुचित है। सरकार को चाहिए कि वह निजी कंपनियों के खातों का खुला ऑडिट कराए। आज हालत यह है कि वित्तीय तंगहाली का रोना रोने वाली ये कंपनियां अपने ऑफिसों में नए एयर कंडीशंड कमरों को तोडकर दोबारा भव्य निर्माण करवा रही है। यही बिजली दरों में वृद्धि का मूल कारण है। सरकार निजी कंपनियों की मनमानी को रोकने के लिए कठोर कदम उठाए न कि उनके सामने घुटने टेक दे।


(यह पत्र 21 जून 2004 को नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हुआ।)