Sunday, 17 August 2014

न्यायिक आतंक

संपादकीय टिप्पणी "न्यायिक आतंक का भंडाफोडसराहनीय है। आज अदालतों में सब कुछ मिल जाता है, अगर नही मिलता तो वह सिर्फ न्याय है। चंद सिक्के उछाल कर मनचाहा फैसला अपने हक में कोई भी प्राप्त कर सकता है। जिस देश में राष्ट्रपति और मुख्य न्यायधीश तक सुरक्षित नही हैं वहां आम जनता का हाल क्या होगा, वह खुद सरकार को भी नहीं मालूम। जिस मजिस्ट्रेट ने बिना जांचपडताल के वारंट जारी कर दिया उस को अपनी कुर्सी पर बैठने का कोई नैतिक अधिकार नही है। जो मजिस्ट्रेट देश के राष्ट्रपति और मुख्य नियायधीश का नाम भी नही जानता, उस से न्याय की उम्मीद क्या कर सकते हैं।
अब समय आ गया है कि सरकार न्याय प्रक्रिया को सही करे और इस बात का पुख्ता प्रबंध करे कि बिना जांचपडताल के कोई वारंट जारी न हो क्योंकि जब न्यायलयों में मुकदमों के फैसलों में सालों लग जाते है तब वारंट निकालते समय कुछ समय जांचपडताल में भी लगाना चाहिए।


(यह पत्र सरिता अप्रैल (द्वितीय) 2004 में प्रकाशित हुआ।)