Sunday, 27 July 2014

गुड फील फैक्टर

लेख गुड फील फैक्टर’ (फरवरी, द्वितिय) बिलकुल ठीक दर्शाता है कि फील गुड सिर्फ एक नया नारा ही है। 3 राज्यों में चुनाव जीतने के बाद भारतीय जनता पार्टी के लिए फील गुड तो ठीक है लेकिन इस का यह मतलब बिलकुल नही लगाना चाहिए कि आम जनता भी फील गुड को सही मानती है। यदि देखा जाए तो 3 राज्यों में भाजपा की जीत का कारण कांग्रेस के खिलाफ जनता का आक्रोश रहा है क्योंकि इन राज्यों में कांग्रेस सरकारों ने आम जनता के उत्थान हेतु कोई विशेष प्रयास नहीं किया।
लेख बिलकुल सही बतलाता है कि केंद्र में भाजपा की पिछले 5 सालों में कोई विशेष उपलब्धि नही रही है, क्योंकि रोजगार के अवसर कम हुए हैं। वीआरएस योजना ने कर्मचारियों को घर पर बैठा दिया है। विकास दर भी कम हुई है। भविष्य में विकास वृद्धि दर 8 फीसदी तक आंकी जा रही है जोकि मात्र एक कल्पना है, इस का आधार क्या है इसे बतलाने में भाजपा सरकार असमर्थ है। भष्ट्राचार और धोटाले पढे हैं। बिजली, शिक्षा और स्वास्थय के निजीकरण से ये सुविधाएं अधिक मंहगी हो गई हैं और आम जनता की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं।
जब तक नए रोजगार के अवसर शहरों और गांवों में समान रूप में उपलब्ध नहीं होते हैं तब तक आम जनता के लिए फील गुड नही हो सकता।
एक चुनावी नारा, हर चुनाव के बाद भुला दिया जाता है।


(यह पत्र सरिता अप्रैल (प्रथम) 2004 में प्रकाशित हुआ।)